7 वजहें क्यों चेतेश्वर पुजारा की विदाई बनी भावनात्मक और अधूरी कहानी

परिचय — भारतीय क्रिकेट की ‘दीवार’ का संन्यास
24 अगस्त 2025 का दिन भारतीय क्रिकेट के इतिहास में भावुक पन्नों में दर्ज हो गया। टेस्ट क्रिकेट के भरोसेमंद बल्लेबाज चेतेश्वर पुजारा ने अपने शानदार करियर को अलविदा कह दिया। वर्षों तक भारत के लिए नंबर-3 पर बल्लेबाजी कर उन्होंने एक मजबूत दीवार का काम किया। राहुल द्रविड़ के बाद उन्हें ही टीम इंडिया की नई ‘दीवार’ कहा गया।
लेकिन उनकी विदाई उतनी सम्मानजनक और भव्य नहीं रही, जितनी होनी चाहिए थी। यही कसक न सिर्फ उनके फैंस के दिल में रही, बल्कि कांग्रेस नेता शशि थरूर ने भी अपने इमोशनल पोस्ट के जरिए व्यक्त की।
1. 103 टेस्ट और 19 शतक का गौरवशाली करियर
चेतेश्वर पुजारा ने 2008 में अपना पहला टेस्ट मैच खेला और देखते-देखते 15 वर्षों का सफर तय कर लिया।
- कुल टेस्ट मैच: 103
- कुल रन: 7195
- शतक: 19
- औसत: 43.60
ये आंकड़े बताते हैं कि उन्होंने सिर्फ लंबा करियर नहीं खेला, बल्कि लगातार टीम के लिए योगदान दिया। वे अक्सर तब चमके जब टीम संकट में होती थी। यही वजह है कि उन्हें आधुनिक टेस्ट क्रिकेट का ‘Mr. Reliable’ कहा गया।
2. ऑस्ट्रेलिया में 2018-19 की ऐतिहासिक जीत के नायक
भारत ने 2018-19 में ऑस्ट्रेलिया की धरती पर पहली बार टेस्ट सीरीज़ जीती। इस सीरीज़ में पुजारा ने अकेले 521 रन बनाए और ‘प्लेयर ऑफ द सीरीज़’ बने।
उनकी पारियाँ धीमी ज़रूर थीं, लेकिन हर गेंद पर खड़े रहने का जज़्बा भारत के लिए जीत की कुंजी बना। यही वजह है कि उन्हें क्रिकेट जगत में ‘Test Warrior’ का नाम मिला।
3. शशि थरूर की भावनात्मक प्रतिक्रिया
शशि थरूर ने सोशल मीडिया पर लिखा कि,
“मन में कसक है कि पुजारा को वैसी विदाई नहीं मिली, जिसके वे हकदार थे। उन्होंने भारतीय क्रिकेट को स्थिरता और गर्व दिया। उन्हें लंबा साथ और एक सम्मानजनक विदाई मिलनी चाहिए थी।”
थरूर की यह पोस्ट उस भावना का प्रतीक है, जिसे करोड़ों फैंस भी महसूस कर रहे थे। उन्होंने यह भी लिखा कि पुजारा ने टीम से बाहर होने के बाद भी हिम्मत नहीं हारी और घरेलू क्रिकेट में शानदार प्रदर्शन किया।

4. घरेलू क्रिकेट में संघर्ष और वापसी
कई लोग मानते थे कि पुजारा का करियर खत्म हो चुका है, लेकिन उन्होंने इसका जवाब मैदान पर दिया।
- रणजी ट्रॉफी में सौराष्ट्र के लिए कई शतक जड़े।
- इंग्लैंड की काउंटी क्रिकेट में ससेक्स की ओर से खेलते हुए ढेरों रन बनाए।
- लगातार यह साबित किया कि वे अब भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खेलने की क्षमता रखते हैं।
उनकी जिजीविषा ने यह दिखा दिया कि क्रिकेट केवल प्रतिभा से नहीं, बल्कि मेहनत और अनुशासन से जीता जाता है।
5. सचिन तेंदुलकर सहित दिग्गजों की श्रद्धांजलि
सचिन तेंदुलकर ने पुजारा की तारीफ करते हुए कहा:
“जब भी आप नंबर-3 पर बल्लेबाजी करने उतरते, टीम को एक अलग भरोसा मिलता था।”
इसी तरह विराट कोहली, रोहित शर्मा, अजिंक्य रहाणे और रविचंद्रन अश्विन जैसे खिलाड़ियों ने भी उन्हें ‘भरोसे का प्रतीक’ बताया। अनिल कुंबले ने कहा कि पुजारा ने अपनी बल्लेबाजी से क्रिकेट के असली रूप को जिंदा रखा।
6. क्यों अधूरी रह गई विदाई?
पुजारा ने भले ही सोशल मीडिया पर एक भावनात्मक पोस्ट के जरिए संन्यास की घोषणा की, लेकिन कई सवाल अनुत्तरित रह गए।
- क्यों उन्हें आखिरी टेस्ट में मौका नहीं दिया गया?
- क्यों उनके योगदान का जश्न एक विशेष फेयरवेल मैच से नहीं मनाया गया?
- क्या चयनकर्ताओं ने उन्हें बहुत जल्द नज़रअंदाज़ कर दिया?
इन्हीं सवालों ने उनकी विदाई को अधूरा बना दिया।
7. पुजारा की विरासत और प्रेरणा
पुजारा का करियर सिर्फ आंकड़ों तक सीमित नहीं था।
- उन्होंने दिखाया कि क्रिकेट में धैर्य भी उतना ही जरूरी है जितना आक्रामकता।
- उन्होंने युवा खिलाड़ियों को सिखाया कि संकट की घड़ी में टिके रहना ही असली जीत है।
- उन्होंने यह भी साबित किया कि टेस्ट क्रिकेट अब भी प्रासंगिक है और रोमांच से भरा हुआ है।
8. पुजारा की 10 सबसे यादगार पारियाँ
- 2010, बैंगलोर बनाम ऑस्ट्रेलिया – करियर की पहली बड़ी पारी, 72 रन।
- 2012, अहमदाबाद बनाम इंग्लैंड – शानदार 206 रन।
- 2012, नागपुर बनाम इंग्लैंड – नाबाद 135 रन, संकटमोचक पारी।
- 2013, हैदराबाद बनाम ऑस्ट्रेलिया – शानदार 204 रन।
- 2013, जोहान्सबर्ग बनाम साउथ अफ्रीका – 153 रन, विदेशी धरती पर क्लासिक पारी।
- 2017, रांची बनाम ऑस्ट्रेलिया – 202 रन, 500 गेंदों की मैराथन पारी।
- 2018, एडिलेड बनाम ऑस्ट्रेलिया – 123 रन, भारत की ऐतिहासिक जीत की नींव।
- 2019, सिडनी बनाम ऑस्ट्रेलिया – 193 रन, सीरीज़ जीत पक्की की।
- 2021, ब्रिस्बेन बनाम ऑस्ट्रेलिया – 56 रन, लेकिन शरीर पर कई गेंदें झेलकर टीम को ऐतिहासिक जीत दिलाई।
- 2022, लॉर्ड्स बनाम इंग्लैंड (काउंटी) – 231 रन, दिखाया कि वे अब भी अमर हैं।
ये पारियाँ बताती हैं कि पुजारा सिर्फ रन बनाने वाले खिलाड़ी नहीं थे, बल्कि वे टीम के लिए ढाल की तरह खड़े होते थे।
9. करियर के उतार-चढ़ाव
पुजारा का करियर आसान नहीं रहा।
- उन्हें कई बार टीम से बाहर किया गया।
- उनकी स्ट्राइक रेट की आलोचना हुई।
- लेकिन हर बार उन्होंने जवाब अपने बल्ले से दिया।
यही वजह है कि उन्हें आलोचना के बावजूद हमेशा ‘टीम मैन’ कहा गया।
10. व्यक्तिगत जीवन और क्रिकेट फिलॉसफी
पुजारा हमेशा लो-प्रोफाइल रहे।
- वे ना तो विज्ञापनों की भीड़ का हिस्सा बने,
- ना ही मैदान से बाहर विवादों में फंसे।
उनकी क्रिकेट फिलॉसफी साफ थी — “टीम पहले, मैं बाद में।”
यही सोच उन्हें खास बनाती है।
निष्कर्ष — अधूरी विदाई, पूरी विरासत
चेतेश्वर पुजारा ने भारतीय क्रिकेट को ऐसा धैर्य और स्थिरता दी, जिसकी तुलना करना मुश्किल है। उनकी विदाई भले ही अधूरी रही हो, लेकिन उनकी विरासत हमेशा पूरी रहेगी। आने वाली पीढ़ियां उन्हें याद करेंगी एक ऐसे खिलाड़ी के रूप में जिसने दिखाया कि क्रिकेट सिर्फ आक्रामकता नहीं, बल्कि संयम और समर्पण का खेल भी है।
वास्तव में, पुजारा की कहानी अधूरी विदाई की नहीं, बल्कि पूरी विरासत की है।

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