हर 10 में से 8 भारतीयों ने कहा कि उन्हें अपने बुज़ुर्ग माता-पिता की देखभाल के लिए मदद की ज़रूरत है, यह बात जेन एस लाइफ सर्वे में सामने आई।

० 72% लोगों को माता-पिता की सेहत की सबसे ज़्यादा चिंता है।

० 68% लोग माता-पिता की अकेलापन और सामाजिक दूरी से परेशान हैं।

० 62% बुज़ुर्ग अपने बच्चों से दूर खुद रहते हैं। चाहे शहर में, देश के किसी और हिस्से में या विदेश में हों।

० सिर्फ 2% बुज़ुर्ग ही सीनियर केयर सेंटर्स में रहते हैं।

० 54% वयस्क बच्चे रोज़ अपने माता-पिता की चिंता करते हैं।

० 46% नियमित रूप से आर्थिक मदद करते हैं, जबकि 26% कभी-कभी सहयोग देते हैं।

भारत, 15 सितंबर 2025: जेन एस लाइफ, जो 60 साल से ऊपर के लोगों के लिए एक ऐप है, उसने एक सर्वे किया।  इसमें पता चला कि परिवार अपने माता-पिता के लिए प्यार, दूरी, पैसे और ज़िम्मेदारी के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रहे हैं। इसमें टियर 1 और 2 शहरों के 1,000 से ज़्यादा लोगों से बात की गई।

सर्वे में  72% लोगों ने अपने माता-पिता की सेहत को अपनी सबसे बड़ी चिंता बताया। इसके बाद 68% लोगों ने अकेलेपन को एक गंभीर समस्या माना। वहीं 42% ने सुरक्षा, 39% ने सामाजिक जीवन और 37% ने पैसों को दूसरी बड़ी चिंताओं के रूप में बताया। इससे साफ़ है कि बुज़ुर्गों की देखभाल में अब सेहत और भावनात्मक सुख-शांति दोनों ही ज़रूरी है।

माता-पिता का रहन-सहन भी बदल रहा है। 62% माता-पिता अब खुद अकेले रहते हैं। चाहे उसी शहर में, देश के किसी और हिस्से में या विदेश में हों। सिर्फ 2% बुज़ुर्ग सीनियर केयर सेंटर्स में रहते हैं। इस दूरी की वजह से बच्चे परेशान रहते हैं। 54% बच्चों ने माना कि वे रोज़ाना अपने माता-पिता की चिंता करते हैं, खासकर काम के समय।

माता-पिता की देखभाल सिर्फ भावनात्मक नहीं बल्कि आर्थिक भी होती है। सर्वे में पाया गया कि 46% लोग माता-पिता के खर्चों में नियमित मदद करते हैं। जबकि 26% लोग कभी-कभी  सहयोग देते हैं। फिर भी 57% लोगों को लगता है कि वे पर्याप्त मदद नहीं कर पा रहे हैं।  यह देखभाल से जुड़ी छिपी हुई भावनात्मक कीमत को दिखाता है।

सबसे अहम बात है कि, हर 10 में से 8 लोगों ने कहा कि अगर भरोसेमंद और सस्ती देखभाल की सुविधा मिले तो वे उसे अपनाएँगे। कई लोग इसके लिए पैसे देने को भी तैयार हैं। यह दिखाता है कि भारतीय परिवार अब ऐसे संगठित देखभाल समाधानों को अपनाने के लिए तैयार हैं, जो प्यार और व्यावहारिक सहयोग के बीच संतुलन बनाएँ।

नतीजों पर टिप्पणी करते हुए जेन एस लाइफ की फाउंडर, मीनाक्षी मेनन ने कहा कि, “ये आंकड़े दिखाते हैं कि सेहत और अकेलापन असली चुनौतियाँ हैं। जिसे लाखों भारतीय रोज़ जीते हैं। हर 10 में से 8 लोग संगठित देखभाल को अपनाने के लिए तैयार हैं, एक बड़ा बदलाव दिखाता है। परिवार मदद इसलिए नहीं चाहते कि उन्हें परवाह कम है, बल्कि इसलिए कि वे और बेहतर देखभाल करना चाहते हैं।”

सर्वे ने शहर और छोटे कस्बों के फर्क को भी बताया।

 शहरों में 71% लोगों को माता-पिता के अकेलेपन की चिंता है। छोटे कस्बों में 69% लोगों को स्वास्थ्य आपात स्थिति की चिंता है। 63% लोगों ने माना कि दूरी की वजह से उन्हें अपराधबोध होता है, क्योंकि मदद करने के बावजूद उन्हें लगता है कि माता-पिता खुश नहीं हैं।

इस रिसर्च के ज़रिए जेन एस लाइफ ने बुज़ुर्गों और उनकी देखभाल करने वालों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को दोहराया है। इसके लिए यह हेल्थकेयर, सुरक्षा, साथ और भागीदारी जैसी सेवाओं का नेटवर्क बनाकर बुज़ुर्गों की देखभाल के व्यावहारिक और भावनात्मक दोनों पहलुओं को संबोधित करने की कोशिश कर रहा है। आसान विकल्पों के रूप में जेन एस लाइफ सिल्वर प्लान ₹990 प्रति वर्ष और गोल्ड प्लान ₹4,900 प्रति वर्ष में उपलब्ध है। इसका मकसद है कि हर परिवार आसानी से और सस्ती दरों पर बुज़ुर्गों की देखभाल कर सके।

असल में संदेश बहुत सीधा है: माता-पिता की देखभाल सिर्फ ज़िम्मेदारी नहीं, बल्कि प्यार, सम्मान और जुड़ाव भी है। जेन एस लाइफ परिवारों की मदद करने के लिए प्रतिबद्ध है परिवारों को यह भरोसा दिलाता है कि वे अकेले नहीं हैं। यह बच्चों और माता-पिता के रिश्ते को लेन-देन से निकालकर प्यार और सच्चे जुड़ाव पर आधारित बनाना चाहता है।

जेन एस लाइफ ने पूरे भारत में 30-45 साल के बच्चों पर एक ऑनलाइन सर्वे किया, जो अपने बुज़ुर्ग माता-पिता की देखभाल करते हैं। इसका मकसद यह जानना था कि उन्हें माता-पिता की देखभाल में कौन- कौन सी बड़ी परेशानियाँ आती हैं। इसके अलावा, जेन एस लाइफ ने अलग-अलग कंपनियों के कर्मचारियों से सीधी बातचीत भी की, जिन्होंने सर्वे में हिस्सा लिया, ताकि और अच्छी तरह जानकारी मिल सके।

जेन एस लाइफ चाहता है कि माता-पिता की देखभाल करने वालों के लिए यह काम आसान हो। इसके लिए यह ब्रांड कंपनियों और उनके कर्मचारियों से लगातार जुड़कर उनकी जरूरतें और मुश्किलें समझने की कोशिश करता है। “सैंडविच जेनरेशन” (जो अपने बच्चों और माता-पिता दोनों की देखभाल करते हैं) के दबाव को समझते हुए, जेन एस लाइफ उन्हें यह भरोसा देना चाहता है कि वे अकेले नहीं हैं। यह ब्रांड चाहता है कि माता-पिता और बच्चों का रिश्ता सिर्फ लेन-देन वाला न रहे, बल्कि प्यार, देखभाल और सच्चे जुड़ाव पर आधारित हो।

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12 thoughts on “हर 10 में से 8 भारतीयों ने कहा कि उन्हें अपने बुज़ुर्ग माता-पिता की देखभाल के लिए मदद की ज़रूरत है, यह बात जेन एस लाइफ सर्वे में सामने आई।

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