फेफड़े में फंसी मूंगफली, ऑक्सीजन 40% पर आ गई: फरीदाबाद में दो मासूम बच्चों की जान बाल-बाल बची

रोज़मर्रा की फीडिंग बनी जानलेवा, डॉक्टरों ने समय से पहले मौत को दी मात
फरीदाबाद, 17 जनवरी 2026:
सर्दियों का एक सामान्य सा दिन फरीदाबाद के दो परिवारों के लिए मौत से जंग में बदल गया, जब उनके नन्हे बच्चों ने अनजाने में खाने के कण सांस के रास्ते अंदर खींच लिए। यह कण चुपचाप फेफड़ों में फंस गए और दोनों बच्चों को जानलेवा श्वसन संकट के कगार पर पहुंचा दिया।
मकर संक्रांति के दिन, कुछ ही घंटों के अंतराल में एक-एक साल और आठ महीने के दो शिशुओं को गंभीर हालत में Amrita Hospital, Faridabad लाया गया। डॉक्टरों का कहना है कि अगर ज़रा भी देर हो जाती, तो दोनों मामलों में नतीजा घातक हो सकता था।
एक हफ्ते से चल रही सांस की तकलीफ — वजह बनी एक मूंगफली
पहला बच्चा, जिसकी उम्र एक साल तीन महीने थी, पिछले करीब एक हफ्ते से लगातार खांसी और सांस लेने में तकलीफ से जूझ रहा था। वह पहले किसी अन्य अस्पताल में इलाज करा रहा था, लेकिन हालत लगातार बिगड़ती जा रही थी। जब उसे अमृता अस्पताल की इमरजेंसी में लाया गया, तब उसका ऑक्सीजन स्तर खतरनाक रूप से गिर चुका था और वह सांस के लिए जूझ रहा था।
रात भर बच्चे को पीडियाट्रिक आईसीयू (PICU) में स्थिर करने के बाद अगली सुबह डॉक्टरों ने आपातकालीन ब्रोंकोस्कोपी की। अंदर का दृश्य चौंकाने वाला था — बच्चे की दाईं मुख्य सांस नली पूरी तरह एक मूंगफली से बंद थी, जिससे पूरे फेफड़े तक हवा नहीं पहुंच पा रही थी।
Dr. Sourabh Pahuja, सीनियर कंसल्टेंट, पल्मोनरी मेडिसिन ने बताया,
“मूंगफली जैसे खाद्य पदार्थ सांस की नली में जाकर नमी के संपर्क में आते ही फूल जाते हैं। इस मामले में फेफड़े तक हवा पहुंच ही नहीं रही थी। अगर और देरी होती, तो फेफड़ा बैठ सकता था, गंभीर संक्रमण हो सकता था या ऑक्सीजन की जानलेवा कमी हो सकती थी।”
समय रहते मूंगफली निकाल ली गई। कुछ ही घंटों में बच्चे का ऑक्सीजन स्तर सुधर गया और अगले दिन उसे छुट्टी दे दी गई।
बच्चे के पिता ने कहा,
“हमें लगा था कि बस ज़िद्दी खांसी है। हमें ज़रा भी अंदाज़ा नहीं था कि फेफड़े के अंदर कुछ फंसा है। डॉक्टरों ने हमारे बच्चे की जान बचा ली।”
ऑक्सीजन 40% पर — ज़िंदगी और मौत के बीच झूलता मासूम
कुछ ही घंटों बाद अस्पताल में इससे भी ज़्यादा डरावना मामला सामने आया। आठ महीने के एक बच्चे को सिर्फ 40 प्रतिशत ऑक्सीजन सैचुरेशन के साथ लाया गया — जिसे डॉक्टर बेहद जानलेवा स्थिति मानते हैं।
मेडिकल रिकॉर्ड से पता चला कि बच्चा पिछले करीब 10 दिनों से बीमार था और कहीं और इलाज चल रहा था। जांच में सामने आया कि उसके बाएं फेफड़े में कोई बाहरी वस्तु गहराई तक फंसी हुई है।
डॉ. पाहुजा ने कहा,
“इंतज़ार का कोई समय नहीं था। बच्चा ऑक्सीजन बनाए नहीं रख पा रहा था। हर मिनट की कीमत थी।”
बच्चे को तुरंत ऑपरेशन थिएटर ले जाया गया। उसकी सांस की नली बेहद छोटी थी और ऑक्सीजन का स्तर बेहद कम — ऐसे में प्रक्रिया अत्यंत चुनौतीपूर्ण थी। जब सामान्य उपकरण काम नहीं आए, तो डॉक्टरों ने अत्याधुनिक फ्रीज़िंग तकनीक (क्रायोथेरेपी) का इस्तेमाल कर जैविक विदेशी वस्तु को सुरक्षित तरीके से निकाल लिया।
डॉ. पाहुजा ने बताया,
“वस्तु कुछ ही मिनटों में निकाल ली गई, लेकिन कई दिनों तक अंदर फंसी रहने के कारण सांस की नली में सूजन और नुकसान हो चुका था।”
बच्चे को दो से तीन दिन तक गहन निगरानी में रखा गया। सांस सामान्य होने के बाद उसे भी छुट्टी दे दी गई।
बच्चे की मां ने कहा,
“हमें कहा गया था कि शायद हमारा बच्चा रात नहीं निकाल पाएगा। जब हमने उसे फिर से सामान्य सांस लेते सुना, तो वो किसी चमत्कार से कम नहीं था।”
टीमवर्क से बची दो ज़िंदगियां

डॉक्टरों ने बताया कि दोनों बच्चों की जान एक अत्यंत समन्वित और बहु-विषयक मेडिकल टीम की वजह से बच पाई।
इन मामलों का संयुक्त रूप से नेतृत्व किया Dr. Maninder Singh Dhaliwal, प्रिंसिपल कंसल्टेंट, PICU एवं पीडियाट्रिक रेस्पिरेटरी मेडिसिन ने, साथ में डॉ. सौ़रभ पाहुजा, विशेष पीडियाट्रिक एनेस्थीसिया टीम, क्रिटिकल केयर नर्सिंग स्टाफ और रेस्पिरेटरी थैरेपिस्ट — सभी ने बेहद दबाव में एक साथ काम किया।
डॉ. धालीवाल ने कहा,
“शिशुओं में सांस की नली में बाहरी वस्तु फंसना सबसे जटिल आपात स्थितियों में से एक है। इन बच्चों के पास ऑक्सीजन का ज़रा भी अतिरिक्त भंडार नहीं होता। एनेस्थीसिया से लेकर एयरवे तक हर कदम बेहद सटीक होना चाहिए। गलती की कोई गुंजाइश नहीं होती।”
डॉक्टरों की सख़्त चेतावनी
डॉक्टरों का कहना है कि ऐसे मामले जितना माता-पिता सोचते हैं, उससे कहीं ज़्यादा आम हैं — और अक्सर इसलिए जानलेवा बन जाते हैं क्योंकि शुरुआती संकेतों को नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है।
डॉ. पाहुजा ने चेतावनी दी,
“खाना खिलाते समय अचानक खांसी आना कभी भी हल्के में न लें। अगर खांसी, घरघराहट या सांस की तकलीफ एक दिन से ज़्यादा बनी रहे, तो तुरंत जांच कराएं। संभव है कि खाना सांस की नली में चला गया हो।”
उन्होंने यह भी कहा कि हर अस्पताल ऐसी आपात स्थितियों को संभालने में सक्षम नहीं होता।
“शिशुओं की सांस की नली से बाहरी वस्तु निकालने के लिए विशेष प्रशिक्षण, पीडियाट्रिक एनेस्थीसिया सपोर्ट और उन्नत उपकरणों की ज़रूरत होती है। कम संसाधन वाले केंद्रों में कीमती समय गंवाना बच्चे की जान ले सकता है।”
हर माता-पिता के लिए ज़रूरी संदेश
डॉक्टर माता-पिता को सख़्त सलाह देते हैं:
- शिशुओं को मूंगफली, काजू जैसे छोटे और सख़्त खाद्य पदार्थ कभी न दें
- खाना खिलाते समय हमेशा निगरानी रखें
- छोटे-छोटे सामान बच्चों की पहुंच से दूर रखें
दोनों बच्चे फरीदाबाद के ही थे। डॉक्टरों का कहना है कि समय पर इलाज से उनकी जान बच गई — लेकिन नतीजा बिल्कुल अलग भी हो सकता था।
डॉक्टरों ने दो टूक कहा,
“यह पूरी तरह से रोकी जा सकने वाली त्रासदी है। क्योंकि जब बच्चे की सांस रुकती है, तो दूसरा मौका नहीं मिलता।”

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