समलैंगिक शादी को मान्यता देने से सुप्रीम कोर्ट का इनकार कहा, क़ानून में बदलाव के बाद फ़ैसला संभव

नई दिल्ली: समलैंगिक विवाह और इस रिलेशनशिप के सोशल स्टेटस को मान्यता देने की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट में 18 समलैंगिक जोड़ों ने याचिका दायर की थी. इस याचिका पर पर समलैंगिक शादी को लेकर  एक बड़ा फ़ैसला आया है . सुप्रीम कोर्ट ने समलैंगिक शादी को मान्यता देने से इनकार कर दिया है. सीजेआई डी. वाई. चन्द्रचूड़  ने कहा कि यह संसद के अधिकार क्षेत्र का मामला है. उन्होंने केंद्र सरकार को समलैंगिकों के अधिकारों के लिए उचित कदम उठाने के दिशा-निर्देश जारी किए हैं. दरअसल, देशभर की निगाहें आज समलैंगिक विवाह को मान्यता देने वाली याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर टिकी हुई थीं.

सीजेआई ने कहा, जीवन साथी चुनना जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है. साथी चुनने और उस साथी के साथ जीवन जीने की क्षमता जीवन और स्वतंत्रता के अधिकार के दायरे में आती है.  सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एलजीबीटी समुदाय समेत सभी व्यक्तियों को साथी चुनने का अधिकार है. 

समाज का हिस्सा हैं समलैंगिक लोग 

सीजेआई ने कहा कि यह समलैंगिक लोग कोई बाहरी समुदाय से नहीं आते न तो वे सफ़ेदपोश की तरह हमारी सोसाइटी के लिए बोझ होते हैं. वे लोग भी हमारी सोसाइटी के हिस्सा है. समाज में कोई भी इंसान समलैंगिक होने का दावा कर सकता हैं, बल्कि गांव में कृषि कार्य से लेकर फ़ैक्ट्री में काम करने वाले मज़दूर और एक महिला भी समलैंगिक होने का दावा कर सकती है. सुप्रीम कोर्ट समलैंगिक रिश्तों को पहले ही वैध बता चुका है. वहीं 11 मई 2023 को 10 दिन की लंबी सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने इस पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था.

याचिका में क्या की गई मांग?

सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता में 5 जजों की बेंच ने इस मामले में 11 मई को फैसला सुरक्षित रख लिया था. दरअसल,18 समलैंगिक जोड़ों की तरफ से याचिका दायर की गई थी. याचिककर्ताओं ने मांग की है कि इस तरह की शादी को कानूनी मान्यता दी जाए.

पहले अपराध था समलैंगिक विवाह 

साल 2018 में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने ही सेम सेक्स रिलेशनशिप को अपराध की श्रेणी से बाहर करने वाला फैसला दिया था अभी तक समलैंगिक विवाह के लिए कानूनी दावा नहीं किया जा सकता है. दरअसल, ..दरअसल, IPC की धारा 377 के तहत समलैंगिक संबंधों को अपराध माना जाता था. हालांकि, दुनिया में देखा जाए तो 33 ऐसे देश हैं, जहां समलैंगिक विवाह को मान्यता है.

सरकार ने समलैंगिक विवाह का जताया विरोध

केंद्र सरकार हमेशा से समलैंगिक विवाह की मांग के विरोध में रही है. भारत सरकार ने कहा कि ये न केवल देश की सांस्कृतिक और नैतिक परंपरा के खिलाफ है बल्कि इसे मान्यता देने से पहले 28 कानूनों के 158 प्रावधानों में बदलाव करते हुए पर्सनल लॉ से भी छेड़छाड़ करनी होगी. 

दुनिया के कई देशों में समलैंगिक विवाह को मान्यता

बता दें कि दुनिया के 194 देशों में से कुछ ही देशों ने सेम सेक्स मैरिज या समलैंगिक विवाह को मान्यता दी है. दुनिया भर में केवल 34 देशों ने समान-लिंग विवाहों को वैध बनाया है, जिनमें से 24 देशों ने इसे विधायी प्रक्रिया के माध्यम से, जबकि  9 ने विधायिका और न्यायपालिका की मिश्रित प्रक्रिया के माध्यम से यह किया है. जबकि दक्षिण अफ्रीका अकेला देश है, जहां इस प्रकार के विवाहों को न्यायपालिका द्वारा वैध किया गया है. 

केंद्र के मुताबिक, अमेरिका और ब्राजील प्रमुख देश हैं, जहां मिश्रित प्रक्रिया को अपनाया गया था. विधायी प्रक्रिया के माध्यम से समान-लिंग विवाह को वैध बनाने वाले महत्वपूर्ण देश यूके, ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी, फ्रांस, कनाडा, स्विट्जरलैंड, आयरलैंड, स्वीडन, स्पेन, नॉर्वे, नीदरलैंड, फिनलैंड, डेनमार्क, क्यूबा, स्लोवेनिया और बेल्जियम हैं.  एंडोरा, क्यूबा और स्लोवेनिया, तीन ऐसे देश हैं जहां पिछले साल सेम सेक्स मैरिज को कानूनी रूप से वैध करार दिया गया है.

कई देशों में समलैंगिक विवाह पर मृत्युदंड 

साल 2001 में नीदरलैंड ने सबसे पहले समलैंगिक विवाह को वैध बनाया था. जबकि ताइवान पहला देश था जहां इसे मान्यता दी गई. कुछ बड़े देश ऐसे भी हैं, जहां सेम सेक्स मैरिज स्वीकार्य नहीं है. इनकी संख्या करीब 64 है. यहां सेम सेक्स रिलेशनशिप को अपराध माना गया है और सजा के और सजा के तौर पर मृत्युदंड भी शामिल है. मलेशिया में समलैंगिक विवाह अवैध है. पिछले साल सिंगापुर ने प्रतिबंधों को खत्म कर दिया था. हालांकि, वहां शादियों को मान्यता नहीं है.

दरअसल, भारतीय संस्कृति में समलैंगिकता एक अपराध की श्रेणी में आता है इसलिए सरकार इसे मान्यता नहीं दे रही है. लेकिन समाज में बढ़ रहे सेक्स अपराध को कम करने के लिए सरकार ने इसे अपराध की श्रेणी से बाहर रखा है. ऐसे में भारत में समलैंगिक विवाह को मान्यता देने के मूड में नहीं है.

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11 thoughts on “समलैंगिक शादी को मान्यता देने से सुप्रीम कोर्ट का इनकार कहा, क़ानून में बदलाव के बाद फ़ैसला संभव

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