अमृता विश्वविद्यापीठम ने मनाया पूर्ण वित्तपोषित E4Life पीएच.डी. स्कॉलर्स के पहले बैच का स्नातक समारोह – सतत विकास में रचा इतिहास

अमृता विश्वविद्यापीठम ने अपने ऐतिहासिक और पूर्ण वित्तपोषित E4Life पीएच.डी. प्रोग्राम के पहले स्नातक बैच का जश्न मनाया। सतत विकास को केंद्र में रखकर शुरू किए गए इस अनूठे कार्यक्रम से 9 देशों के 23 शोधार्थियों ने पीएच.डी. पूरी की, जिनमें से कई आर्थिक रूप से वंचित पृष्ठभूमि से आते हैं।
यह कार्यक्रम 2020 में स्कूल फॉर सस्टेनेबल फ्यूचर्स के तहत, कुलाधिपति श्री माता अमृतानंदमयी देवी (अम्मा) के मार्गदर्शन में शुरू हुआ था। हर साल 45 करोड़ रुपये (USD 5.1 मिलियन) की वार्षिक निधि से यह 100 शोधार्थियों को ट्यूशन, आवास, जीवन-यापन और शोध के लिए पूर्ण आर्थिक सहायता देता है।
डॉ. मनीषा वी. रमेश, प्रोवोस्ट एवं डीन, स्कूल फॉर सस्टेनेबल फ्यूचर्स ने कहा,
“यह सिर्फ स्नातक समारोह नहीं, बल्कि भविष्य के लिए आशा का संदेश है। ये 23 शोधार्थी केवल डिग्री धारक नहीं, बल्कि बदलाव के वाहक हैं। मैं चाहती हूं कि ये अम्मा के करुणा और निःस्वार्थ सेवा के भाव को आगे बढ़ाएं।”
ग्रामीण भारत में रहकर बदले विकास के मायने
E4Life की सबसे बड़ी खासियत है लिव-इन-लैब्स® मॉडल – जिसमें शोधार्थी एक साल तक भारत के गांवों में रहकर स्थानीय लोगों के साथ काम करते हैं। यह अनुभव केवल शोध नहीं, बल्कि रिश्ते, भरोसा और मानवीय जुड़ाव बनाने की प्रक्रिया है।
इन शोधार्थियों ने जलवायु परिवर्तन, जनजातीय कल्याण, सार्वजनिक स्वास्थ्य, खाद्य सुरक्षा, लैंगिक समानता और सतत कृषि जैसे क्षेत्रों में काम किया।
कर्नाटक के बाइसे गांव में ज़ाम्बिया के एक शोधार्थी ने कटहल और सी-बकथॉर्न से टिकाऊ मछली चारा बनाकर स्थानीय आजीविका को बढ़ावा दिया।
उत्तर प्रदेश में महिलाओं और बच्चों में एनीमिया घटाने के लिए स्वच्छता और पोषण संबंधी नवाचार किए गए।
केरल के अलप्पाड में मछुआरों, खासकर महिलाओं, को ब्लॉकचेन और ब्लू इकोनॉमी रणनीतियों से सशक्त किया गया।
ईरान के मोजतबा इनायाती ने कहा,
“भारत के गांवों में रहकर मैंने जाना कि करुणा-आधारित ज्ञान जीवन बदल सकता है – मेरा भी। शोध केवल समाधान खोजने का नाम नहीं, बल्कि रिश्ते और विश्वास बनाने की प्रक्रिया है।”
अफ्रीका के हबान्याती एस्टोन जिजी ने कहा,
“मैं अपने देश लौटकर किसानों, महिलाओं और युवाओं के साथ यही मॉडल अपनाना चाहता हूं – जो करुणा में निहित है और लंबे समय तक टिकेगा।”
वैश्विक दृष्टि, स्थानीय जुड़ाव
इस बैच में भारत, ज़ाम्बिया, नाइजीरिया, ज़िम्बाब्वे, युगांडा, घाना, ईरान, तंजानिया और यूनाइटेड किंगडम के शोधार्थी शामिल हैं। उनका कार्य संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) के अनुरूप है, जिसमें आधुनिक तकनीक, पारंपरिक ज्ञान और मानवीय दृष्टिकोण का संगम है।
अम्मा के शब्दों में,
“सतत विकास का असली आधार पिरामिड के निचले स्तर पर खड़े लोगों को सशक्त बनाना है। जब वे मजबूत होंगे, तभी पूरा समाज स्वस्थ और मजबूत बन सकेगा।”
प्रेस मीट में उपस्थित:
डॉ. मनीषा वी. रमेश, प्रोवोस्ट एवं डीन, स्कूल फॉर सस्टेनेबल फ्यूचर्स
डॉ. रविशंकर, प्रिंसिपल, स्कूल फॉर सस्टेनेबल फ्यूचर्स
डॉ. सुधा अरलिकट्टी, प्रोफेसर एवं रिसर्च हेड, स्कूल फॉर सस्टेनेबल फ्यूचर्स

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