कॉमनवेल्थ गेम्स का इतिहास भारत की स्वर्णिम यात्रा और 2010 की ऐतिहासिक जीत जिसने दुनिया को चौंका दिया

परिचय
कॉमनवेल्थ गेम्स केवल एक खेल प्रतियोगिता नहीं बल्कि इतिहास राजनीति संस्कृति और खेल भावना का अनोखा संगम हैं। आज यह दुनिया के सबसे बड़े बहु खेल आयोजनों में गिना जाता है लेकिन इसकी शुरुआत एक ऐसे दौर में हुई थी जब दुनिया का बड़ा हिस्सा ब्रिटिश साम्राज्य के अधीन था। भारत ने भी इन खेलों में अपनी यात्रा एक गुलाम देश के रूप में शुरू की थी। छह खिलाड़ियों के छोटे से दल से लेकर 2010 में दुनिया के सामने अपनी मेजबानी और खेल शक्ति का प्रदर्शन करने तक भारत की कहानी संघर्ष उपलब्धि और गौरव से भरी हुई है।
14 अक्टूबर 2010 का दिन भारतीय खेल इतिहास के सबसे यादगार दिनों में शामिल है। बैडमिंटन स्टार साइना नेहवाल की जीत ने न केवल भारत को स्वर्ण पदक दिलाया बल्कि देश को पहली बार कॉमनवेल्थ गेम्स की पदक तालिका में दूसरे स्थान पर भी पहुंचा दिया। आइए जानते हैं कॉमनवेल्थ गेम्स का पूरा इतिहास भारत की शानदार यात्रा और उन ऐतिहासिक पलों के बारे में जिन्होंने भारतीय खेलों की दिशा बदल दी।
कॉमनवेल्थ गेम्स की शुरुआत कैसे हुई
कॉमनवेल्थ गेम्स की नींव वर्ष 1891 में पड़ी। उस समय ब्रिटिश साम्राज्य दुनिया का सबसे बड़ा साम्राज्य था। ब्रिटिश पादरी जॉन एस्टली कूपर ने एक ऐसा विचार रखा जिसने बाद में खेल इतिहास बदल दिया।
उनका मानना था कि केवल सेना और सत्ता से साम्राज्य मजबूत नहीं होता बल्कि लोगों के बीच आपसी संबंध भी उतने ही महत्वपूर्ण होते हैं। यदि ब्रिटिश साम्राज्य के अलग अलग देशों के खिलाड़ी एक मंच पर प्रतिस्पर्धा करेंगे तो उनके बीच भाईचारा और एकता मजबूत होगी।
उन्होंने इस आयोजन का नाम पैन ब्रिटेनिक फेस्टिवल रखा लेकिन उस समय इसे वास्तविक रूप देने में लगभग दो दशक लग गए।
राजा जॉर्ज पंचम के राज्याभिषेक ने दिखाई नई दिशा
वर्ष 1911 में ब्रिटेन के राजा जॉर्ज पंचम के राज्याभिषेक के अवसर पर लंदन में फेस्टिवल ऑफ एम्पायर आयोजित किया गया। इस आयोजन में ऑस्ट्रेलिया कनाडा न्यूजीलैंड और दक्षिण अफ्रीका जैसे देशों के खिलाड़ी शामिल हुए।
हालांकि यह आधिकारिक कॉमनवेल्थ गेम्स नहीं थे लेकिन इसे इन खेलों का पहला प्रारंभिक स्वरूप माना जाता है। इसी आयोजन ने यह साबित कर दिया कि ब्रिटिश साम्राज्य के देशों के बीच ऐसा खेल आयोजन सफल हो सकता है।
1928 की बैठक जिसने इतिहास बदल दिया
एम्स्टर्डम ओलंपिक 1928 के दौरान ब्रिटिश साम्राज्य के खेल अधिकारियों की महत्वपूर्ण बैठक हुई। इसी बैठक में यह निर्णय लिया गया कि ओलंपिक खेलों से अलग हर चार वर्ष में ब्रिटिश साम्राज्य के देशों के लिए एक स्वतंत्र खेल प्रतियोगिता आयोजित की जाएगी।
यही फैसला आगे चलकर कॉमनवेल्थ गेम्स की आधिकारिक शुरुआत का कारण बना।
पहला कॉमनवेल्थ गेम्स लगभग रद्द हो गया था
16 अगस्त 1930 को कनाडा के हैमिल्टन शहर में पहले ब्रिटिश एम्पायर गेम्स आयोजित होने वाले थे लेकिन आर्थिक समस्याओं ने आयोजन पर संकट खड़ा कर दिया।
उस समय हवाई यात्रा आम नहीं थी और अधिकांश खिलाड़ियों को समुद्री जहाजों से लंबी यात्रा करके कनाडा पहुंचना पड़ता था। कई देशों के पास यात्रा का खर्च उठाने के लिए पर्याप्त धन नहीं था।
आयोजकों ने कई देशों की आर्थिक सहायता की जिसके बाद पहला आयोजन सफलतापूर्वक संपन्न हो सका। यदि उस समय यह सहायता नहीं मिलती तो संभव है कि कॉमनवेल्थ गेम्स का इतिहास वहीं समाप्त हो जाता।
पहले कॉमनवेल्थ गेम्स में कितने खिलाड़ी थे
पहले संस्करण में केवल 11 देशों के लगभग 400 खिलाड़ियों ने भाग लिया।
उस समय सिर्फ छह खेल शामिल थे।
एथलेटिक्स
बॉक्सिंग
स्विमिंग
डाइविंग
कुश्ती
लॉन बॉल्स
आज कॉमनवेल्थ गेम्स में हजारों खिलाड़ी हिस्सा लेते हैं और कई नए खेल इसमें शामिल हो चुके हैं।
पहला स्वर्ण पदक ऑस्ट्रेलिया के रोवर बॉबी पियर्स ने जीता था जिन्होंने बाद में ओलंपिक में भी स्वर्ण पदक अपने नाम किया।
भारत की एंट्री जब देश गुलाम था
भारत ने पहली बार वर्ष 1934 में कॉमनवेल्थ गेम्स में हिस्सा लिया। उस समय भारत ब्रिटिश शासन के अधीन था और भारतीय दल में केवल छह खिलाड़ी शामिल थे।
इसी प्रतियोगिता में पहलवान राशिद अनवर ने कांस्य पदक जीतकर इतिहास रच दिया। यह भारत का पहला कॉमनवेल्थ पदक था।
यह उपलब्धि इसलिए भी विशेष थी क्योंकि उस समय भारत स्वतंत्र नहीं था और देश का अपना राष्ट्रीय ध्वज भी आधिकारिक रूप से अस्तित्व में नहीं था।
द्वितीय विश्व युद्ध ने रोक दिए कॉमनवेल्थ गेम्स
कॉमनवेल्थ गेम्स का इतिहास भी विश्व युद्ध से प्रभावित हुआ।
वर्ष 1942 और 1946 में आयोजित होने वाले खेल द्वितीय विश्व युद्ध के कारण रद्द कर दिए गए।
युद्ध समाप्त होने के बाद वर्ष 1950 में न्यूजीलैंड के ऑकलैंड शहर में इन खेलों की शानदार वापसी हुई।
आज तक यही दो संस्करण हैं जिन्हें युद्ध के कारण रद्द करना पड़ा।
ब्रिटिश एम्पायर गेम्स से कॉमनवेल्थ गेम्स बनने तक
शुरुआत में इन खेलों का नाम ब्रिटिश एम्पायर गेम्स था।
लेकिन जैसे जैसे भारत पाकिस्तान श्रीलंका घाना नाइजीरिया मलेशिया और अन्य देश स्वतंत्र होते गए ब्रिटिश साम्राज्य कमजोर पड़ने लगा।
इसके बाद इन खेलों के नाम भी समय समय पर बदले गए।
ब्रिटिश एम्पायर गेम्स
ब्रिटिश एम्पायर एंड कॉमनवेल्थ गेम्स
ब्रिटिश कॉमनवेल्थ गेम्स
कॉमनवेल्थ गेम्स
आज यही नाम पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है।
मिल्खा सिंह ने भारत को दिलाया पहला स्वर्ण
भारत को कॉमनवेल्थ गेम्स में पहला स्वर्ण पदक जीतने के लिए 24 वर्षों तक इंतजार करना पड़ा।
वर्ष 1958 में कार्डिफ में आयोजित प्रतियोगिता में मिल्खा सिंह ने 440 यार्ड दौड़ मात्र 46.71 सेकंड में पूरी कर स्वर्ण पदक जीत लिया।
वह कॉमनवेल्थ गेम्स की एथलेटिक्स स्पर्धा में स्वर्ण जीतने वाले पहले भारतीय बने।
उनकी ऐतिहासिक जीत के बाद उन्हें फ्लाइंग सिख के नाम से पूरी दुनिया में पहचान मिली।
इसी संस्करण में पहलवान लीला राम ने भी स्वर्ण पदक जीतकर भारत का गौरव बढ़ाया।

भारत ने पहली बार की मेजबानी
भारत ने पहली बार वर्ष 2010 में नई दिल्ली में कॉमनवेल्थ गेम्स की मेजबानी की।
यह दक्षिण एशिया का पहला शहर था जिसने इस प्रतिष्ठित आयोजन की मेजबानी की।
करीब 71 कॉमनवेल्थ देशों और क्षेत्रों के लगभग छह हजार खिलाड़ी 17 खेलों की 272 स्पर्धाओं में उतरे।
पूरी दुनिया की नजर भारत पर थी और मेजबान देश होने के कारण दबाव भी काफी अधिक था।
साइना नेहवाल की जीत जिसने इतिहास बदल दिया
14 अक्टूबर 2010 भारतीय खेल इतिहास का स्वर्णिम दिन बन गया।
बैडमिंटन महिला एकल फाइनल में साइना नेहवाल कोर्ट पर उतरीं। यह मुकाबला केवल व्यक्तिगत स्वर्ण पदक का नहीं था बल्कि पूरे देश की प्रतिष्ठा का प्रश्न बन चुका था।
यदि साइना यह मुकाबला हार जातीं तो भारत पदक तालिका में तीसरे स्थान पर पहुंच जाता।
लेकिन उन्होंने शानदार प्रदर्शन करते हुए स्वर्ण पदक जीत लिया।
इस जीत के साथ भारत का कुल स्वर्ण पदक 38 हो गया जबकि कुल पदकों की संख्या 101 पहुंच गई।
भारत पहली बार कॉमनवेल्थ गेम्स की पदक तालिका में ऑस्ट्रेलिया के बाद दूसरे स्थान पर पहुंच गया।
आज भी यह प्रदर्शन भारत का सर्वश्रेष्ठ कॉमनवेल्थ रिकॉर्ड माना जाता है।
2010 में भारत का ऐतिहासिक प्रदर्शन
नई दिल्ली कॉमनवेल्थ गेम्स में भारत ने कुल 101 पदक जीते।
38 स्वर्ण
27 रजत
36 कांस्य
यह पहली बार था जब भारत ने तीन अंकों में पदक जीतकर पूरी दुनिया को अपनी खेल क्षमता का परिचय दिया।
इस प्रदर्शन ने भारतीय खिलाड़ियों का आत्मविश्वास बढ़ाया और आने वाले वर्षों में ओलंपिक तथा अन्य अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भी भारत का प्रदर्शन लगातार बेहतर होता गया।
कॉमनवेल्थ गेम्स में भारत के यादगार खिलाड़ी
भारत के कई खिलाड़ियों ने इन खेलों में शानदार प्रदर्शन कर देश का नाम रोशन किया।
मिल्खा सिंह
साइना नेहवाल
अभिनव बिंद्रा
सुशील कुमार
गीता फोगाट
योगेश्वर दत्त
मीराबाई चानू
पी वी सिंधु
लवलीना बोरगोहैन
इन खिलाड़ियों की उपलब्धियों ने भारत को कॉमनवेल्थ खेलों में एक मजबूत खेल राष्ट्र के रूप में स्थापित किया।
2026 कॉमनवेल्थ गेम्स में भारत की उम्मीदें
वर्ष 2026 के कॉमनवेल्थ गेम्स स्कॉटलैंड के ग्लासगो में आयोजित हो रहे हैं।
भारत लगभग 125 खिलाड़ियों का दल भेज रहा है जो एथलेटिक्स मुक्केबाजी वेटलिफ्टिंग जूडो तैराकी ट्रैक साइक्लिंग जिम्नास्टिक लॉन बॉल्स थ्री बाय थ्री बास्केटबॉल और पैरा प्रतियोगिताओं में भाग लेगा।
भारतीय खिलाड़ियों से इस बार भी कई स्वर्ण पदकों की उम्मीद की जा रही है।
2030 में फिर भारत में होगा कॉमनवेल्थ गेम्स
कॉमनवेल्थ गेम्स के 100 वर्ष पूरे होने के अवसर पर वर्ष 2030 का आयोजन भारत के अहमदाबाद में प्रस्तावित है।
यदि यह आयोजन सफलतापूर्वक होता है तो भारत दूसरी बार कॉमनवेल्थ गेम्स की मेजबानी करेगा।
यह आयोजन भारतीय खेल अवसंरचना पर्यटन और वैश्विक पहचान को नई ऊंचाई देने वाला साबित हो सकता है।
निष्कर्ष
कॉमनवेल्थ गेम्स का इतिहास केवल खेलों की कहानी नहीं बल्कि बदलती दुनिया बदलते राजनीतिक समीकरणों और खिलाड़ियों के संघर्ष की प्रेरणादायक गाथा है। भारत ने इन खेलों में अपनी शुरुआत एक गुलाम देश के रूप में की लेकिन आज वह कॉमनवेल्थ परिवार के सबसे मजबूत खेल राष्ट्रों में शामिल है।
राशिद अनवर के पहले पदक से लेकर मिल्खा सिंह के ऐतिहासिक स्वर्ण तक और साइना नेहवाल की निर्णायक जीत से लेकर 2010 के रिकॉर्ड 101 पदकों तक भारत ने हर दौर में अपनी क्षमता साबित की है।
आज जब भारतीय खिलाड़ी दुनिया के हर बड़े मंच पर तिरंगा लहरा रहे हैं तब कॉमनवेल्थ गेम्स की यह यात्रा हमें याद दिलाती है कि संघर्ष से शुरू हुई कहानी लगातार सफलता की नई ऊंचाइयों तक पहुंच सकती है। आने वाले वर्षों में भारत के पास इस इतिहास को और अधिक स्वर्णिम बनाने का सुनहरा अवसर है।

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